Narsapur Crochet Lace GI Tag: Andhra Pradesh’s traditional handicraft receives global recognition

नरसापुर क्रोशिया लेस GI टैग: परंपरा, पहचान और आत्मनिर्भर भारत की कहानी

भारत की पारंपरिक हस्तकलाएँ न केवल हमारी सांस्कृतिक विरासत की पहचान हैं, बल्कि लाखों कारीगरों की आजीविका का आधार भी हैं। ऐसी ही एक विशिष्ट और विश्व-प्रसिद्ध हस्तकला है नरसापुर क्रोशिया लेस, जिसे हाल ही में GI टैग (Geographical Indication) प्रदान किया गया है। यह टैग मिलने से इस कला को अंतरराष्ट्रीय पहचान और कानूनी संरक्षण मिला है।


नरसापुर क्रोशिया लेस क्या है?

नरसापुर क्रोशिया लेस एक हाथ से बुनी जाने वाली लेस (Lace) कढ़ाई कला है, जिसमें सूती धागों से बारीक और जटिल डिज़ाइन तैयार किए जाते हैं। इसका उपयोग साड़ियाँ, ड्रेस, कुर्ते, टेबल कवर, पर्दे, बेडशीट, हैंडबैग और सजावटी वस्तुओं में किया जाता है।

यह कला मुख्य रूप से नरसापुर क्षेत्र से जुड़ी है और यहाँ की महिलाओं द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपनाई जाती रही है।


GI टैग क्या होता है?

GI टैग किसी विशेष भौगोलिक क्षेत्र से जुड़े उत्पाद को दिया जाता है, जिसकी गुणवत्ता, प्रतिष्ठा या विशेषता उसी स्थान के कारण होती है।
GI टैग मिलने के बाद:

  • नकली उत्पादों पर रोक लगती है
  • कारीगरों को बेहतर दाम मिलता है
  • अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में पहचान बनती है

नरसापुर क्रोशिया लेस को GI टैग क्यों मिला?

नरसापुर क्रोशिया लेस को GI टैग इसलिए मिला क्योंकि:

  • इसकी बुनाई तकनीक पूरी तरह हाथ से की जाती है
  • डिज़ाइन में अद्वितीय पारंपरिक पैटर्न होते हैं
  • यह कला स्थानीय जलवायु और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी है
  • इसकी गुणवत्ता और टिकाऊपन अन्य लेस से अलग है

इतिहास और परंपरा

नरसापुर में क्रोशिया लेस कला की शुरुआत लगभग 150 वर्ष पहले मानी जाती है। ब्रिटिश काल में यह कला यूरोप तक पहुँची और वहाँ इसकी काफी माँग रही।
आज भी यहाँ हजारों महिलाएँ घर-घर बैठकर इस कला से जुड़ी हैं, जिससे यह महिला सशक्तिकरण का भी प्रतीक बन चुकी है।


कारीगरों को क्या लाभ होगा?

GI टैग मिलने के बाद:

  • स्थानीय कारीगरों की आय में वृद्धि होगी
  • बिचौलियों की भूमिका कम होगी
  • सरकारी योजनाओं और निर्यात अवसरों का लाभ मिलेगा
  • युवाओं का रुझान इस पारंपरिक कला की ओर बढ़ेगा

आत्मनिर्भर भारत और GI टैग

नरसापुर क्रोशिया लेस का GI टैग “वोकल फॉर लोकल” और आत्मनिर्भर भारत अभियान को मजबूती देता है। इससे स्थानीय उत्पादों को वैश्विक मंच पर पहचान मिलती है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था सशक्त होती है।


निष्कर्ष

नरसापुर क्रोशिया लेस केवल एक हस्तकला नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और महिलाओं की मेहनत की जीवंत पहचान है। GI टैग मिलने से इस कला का संरक्षण, प्रचार और विस्तार सुनिश्चित होगा। यह कदम भारत की समृद्ध हस्तकला विरासत को विश्व पटल पर स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है।

FAQ सेक्शन

Q1. नरसापुर क्रोशिया लेस क्या है?
हाथ से बुनी जाने वाली सूती लेस कला, जो आंध्र प्रदेश के नरसापुर क्षेत्र की पहचान है।

Q2. GI टैग मिलने का क्या लाभ है?
कानूनी संरक्षण, नकली उत्पादों पर रोक, बेहतर मूल्य और निर्यात के अवसर।

Q3. यह कला किन उत्पादों में उपयोग होती है?
साड़ियाँ, ड्रेस, पर्दे, टेबल कवर, बेडशीट और सजावटी वस्तुएँ।

MCQ (UPSC / State PCS / SSC)

Q. नरसापुर क्रोशिया लेस को GI टैग किस राज्य से संबंधित है?
A. तमिलनाडु
B. केरल
C. आंध्र प्रदेश
D. ओडिशा

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