Supreme Court Judgment 2025: Women will not get reservation in judicial service

🏛️ सुप्रीम कोर्ट का निर्णय: न्यायिक सेवा में महिलाओं को आरक्षण नहीं मिलेगा?

Updated on: 15 अक्टूबर 2025
Category: भारतीय न्यायपालिका, Women Empowerment, Supreme Court Judgement


🔹 परिचय

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया ने न्यायिक सेवा (Judicial Services) में महिलाओं को आरक्षण देने की मांग पर टिप्पणी करते हुए कहा कि न्यायपालिका में पहले से ही बड़ी संख्या में महिलाएँ मेरिट के आधार पर चयनित हो रही हैं। इसलिए फिलहाल न्यायिक सेवा में महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण की आवश्यकता नहीं है।


🔹 सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी क्या थी?

एक याचिका की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि —

“न्यायपालिका में लगभग 60% पदों पर महिलाएँ कार्यरत हैं, और उन्होंने यह स्थान आरक्षण से नहीं, बल्कि अपनी योग्यता और मेहनत से हासिल किया है।”

न्यायालय ने यह भी कहा कि न्यायिक सेवा को पूरी तरह मेरिट-आधारित प्रणाली (Merit Based System) पर ही चलाया जाना चाहिए ताकि न्यायपालिका की निष्पक्षता बनी रहे।


🔹 आरक्षण का कानूनी परिप्रेक्ष्य

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 के तहत समान अवसर और आरक्षण का अधिकार प्रदान किया गया है।
हालाँकि, यह अधिकार न्यायपालिका पर सीधे लागू नहीं होता, क्योंकि न्यायाधीशों की नियुक्ति एक संवैधानिक प्रक्रिया (Collegium System) के माध्यम से होती है।

  • आरक्षण का लाभ आमतौर पर सरकारी सेवाओं, शिक्षण संस्थानों या अन्य सार्वजनिक पदों तक सीमित है।
  • न्यायिक नियुक्ति में पारदर्शिता और योग्यता सर्वोच्च प्राथमिकता होती है।

🔹 महिलाओं की बढ़ती भागीदारी

सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के अनुसार, आज भारत की निचली न्यायपालिका (Subordinate Judiciary) में महिलाओं की भागीदारी तेजी से बढ़ी है।
कई राज्यों में 50% से अधिक न्यायाधीश महिलाएँ हैं — जो इस बात का उदाहरण है कि वे बिना आरक्षण के भी शीर्ष स्थान प्राप्त कर रही हैं।


🔹 आगे का रास्ता

हालाँकि, महिलाओं की संख्या में वृद्धि उत्साहजनक है, लेकिन उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट में उनकी भागीदारी अभी भी कम है।
इसके लिए विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार और न्यायपालिका को जेंडर बैलेंस, मेंटॉरशिप प्रोग्राम, और न्यायिक प्रशिक्षण संस्थानों में समान अवसर पर ध्यान देना चाहिए।


🔹 निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि “न्यायिक सेवा में आरक्षण नहीं, बल्कि समान अवसर और मेरिट आधारित चयन ही न्यायपालिका की ताकत है।”
इस फैसले ने न्यायिक सेवा में महिलाओं की भूमिका को सम्मानित करते हुए यह संदेश दिया है कि असली सशक्तिकरण आरक्षण से नहीं, बल्कि योग्य प्रदर्शन से आता है।


📌 महत्वपूर्ण तथ्य (Facts to Remember)

  1. भारत की न्यायपालिका में महिलाओं की भागीदारी लगभग 60% है (Subordinate Courts)।
  2. सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक सेवा में महिलाओं के लिए अलग आरक्षण की मांग को अस्वीकार किया।
  3. संविधान का अनुच्छेद 15 और 16 समान अवसर का अधिकार देता है।
  4. न्यायिक नियुक्तियाँ कॉलिजियम सिस्टम के तहत होती हैं।
  5. न्यायालय का कहना है – “Merit ही न्यायपालिका की नींव है।”

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